Sunday, 11 May 2014

kya gazab akhbaar tv hain hmare daur ke...

क्या गज़ब अख़बार- टीवी हैं 
हमारे दौर के 

आवरण जनतंत्र का  निज देह पर 
डाले हुये ये 
अवसरो के साथ अक्सर 
पीत या काले  हुये ये 
कैद इनकी धड़कने हैं 
चमचमाती कोठियों मेँ 
हैं असल में-
धनकुबेरों के सुये पाले हुये ये 

क्या निडर- 
अख़बार-टीवी हैं हमारे दौर के 

है महारथ हाथ रखने की इन्हे 
दुखती  रगों  पर 
बेचते संवेदनाएं कल्पनाओं के 
रथों पर 
हाथ में टी आर पी की ले मशालें 
दौड़ते  हैं - 
सनसनी ,  उत्तेजना ,  सच, झूठ  के 
अन्धे पथों पर

क्या सजग
 अख़बार- टीवी हैं हमारे दौर के   
  
एक पल में 
ये जिसे चाहें उठायें या गिरायें 
मोड़ दें जब मन करे इनका 
हवाओं की दिशायें 
पेड ख़बरें ,आंकड़े ,ओपीनियन 
अनुमान ,सर्वे 
क्या बतायें 
क्या नहीं ,क्या खेल करती ये कथायें 

क्या मुखर 
अख़बार -टीवी हैं हमारे दौर के 


   

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