तुम्हें बस राग अपना छेड़ना है
न सुनना और की, खुद बोलना है.
जवाबों पर ठिठुरती बर्फ़ रखकर
सवालों को सुलगता छोड़ना है.
तुम्हारे सामने मुँह खोलना भी
समूचे मुल्क की आलोचना है .
कभी लफ़्फ़ाज़ियाँ देखीं न ऐसी
न जाने और क्या क्या देखना है.
सदा ख़ुद को बताना चाँद सूरज
उठा कर मुँह फ़लक पर थूकना है.
कभी उतरो हवा की पीठ से ,तो
हक़ीक़त भी समझना, प्रार्थना है.
सुनी है बद् दुआ सबने हमारी
हमारी आह को किसने सुना है!
@जय चक्रवर्ती
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