Tuesday, 18 July 2017

राह कितनी पुरख़तर मत पूछिए

राह कितनी पुरख़तर मत पूछिए
है कटा कैसे सफ़र मत पूछिए .

एक छोटी सी ख़ता ने किस क़दर
कर दिया है दर-ब-दर मत पूछिए.

चाँद तारे सुन रहे थे सिसकियाँ
शह्र था क्यों बेख़बर मत पूछिए.

एक-सा चेहरा पहन कर सब खड़े
कौन किसका पक्षधर मत पूछिए.

कौन पहुँचा है यहाँ तक किस तरह
जानता हूँ सब मगर मत पूछिए .

वन बबूलों के उगे हैं हर तरफ
नीम शीशम हैं किधर मत पूछिए .

उम्र गुज़री है इसी फुटपाथ पर
मित्र मेरा गाँव-घर मत पूछिए.

@जय चक्रवर्ती

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