कहा था जो कबीरा ने कहाँ दैरो-हरम समझे
न पंडित मौलवी समझे न चाकू और बम समझे
पढ़े बिन प्रेम के आखर न ज्ञानी बन सका कोई-
ज़रा सी बात थी लेकिन न तुम समझे न हम समझे।
न पंडित मौलवी समझे न चाकू और बम समझे
पढ़े बिन प्रेम के आखर न ज्ञानी बन सका कोई-
ज़रा सी बात थी लेकिन न तुम समझे न हम समझे।
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