Tuesday, 18 July 2017

राह कितनी पुरख़तर मत पूछिए

राह कितनी पुरख़तर मत पूछिए
है कटा कैसे सफ़र मत पूछिए .

एक छोटी सी ख़ता ने किस क़दर
कर दिया है दर-ब-दर मत पूछिए.

चाँद तारे सुन रहे थे सिसकियाँ
शह्र था क्यों बेख़बर मत पूछिए.

एक-सा चेहरा पहन कर सब खड़े
कौन किसका पक्षधर मत पूछिए.

कौन पहुँचा है यहाँ तक किस तरह
जानता हूँ सब मगर मत पूछिए .

वन बबूलों के उगे हैं हर तरफ
नीम शीशम हैं किधर मत पूछिए .

उम्र गुज़री है इसी फुटपाथ पर
मित्र मेरा गाँव-घर मत पूछिए.

@जय चक्रवर्ती

तुम्हें बस राग अपना छेड़ना है

तुम्हें बस  राग अपना छेड़ना है
न सुनना और की, खुद बोलना है.

जवाबों पर ठिठुरती बर्फ़ रखकर
सवालों को सुलगता छोड़ना है.

तुम्हारे सामने मुँह खोलना भी
समूचे मुल्क की आलोचना है .

कभी लफ़्फ़ाज़ियाँ देखीं न ऐसी
न जाने और क्या क्या देखना है.

सदा ख़ुद को बताना चाँद सूरज
उठा कर मुँह फ़लक पर थूकना है.

कभी उतरो हवा की पीठ से ,तो
हक़ीक़त भी समझना, प्रार्थना है.

सुनी है बद् दुआ सबने हमारी
हमारी आह को किसने सुना है!

@जय चक्रवर्ती

आप कितना बोलते हैं

आप कितना बोलते हैं
आप क्या-क्या बोलते हैं !!

भोर में भी बोलते हैं
शोर में भी बोलते हैं
बोलते हैं चोर से भी-
ज़ोर से भी बोलते हैं

आप कितना बोलते हैं
आप क्या-क्या बोलते हैं !!

आप हाई बोलते हैं
हाई फाई बोलते हैं
बोलते हैं भाई भाई-
फिर कसाई बोलते हैं

आप कितना बोलते हैं
आप क्या-क्या बोलते हैं!!

टोकियो में बोलते हैं
ओहियो में बोलते हैं
बोलते टीवी ट्विटर में-
रेडियो में बोलते हैं

आप कितना बोलते हैं
आप क्या-क्या बोलते हैं!!

आप गिरकर बोलते हैं
आप उठकर बोलते हैं
बोलते हैं आप जमकर-
आप थमकर बोलते हैं

आप कितना बोलते हैं
आप क्या-क्या बोलते हैं!!

आप जब कुछ बोलते हैं
आप सब कुछ बोलते हैं
बोलना हो जब जरूरी-
आप कब कुछ बोलते हैं

आप कितना बोलते हैं
आप क्या-क्या बोलते हैं!!

आप इसको बोलते हैं
आप किसको बोलते हैं
बोलते हैं आप जिसको-
आप उसको बोलते हैं

आप कितना बोलते हैं
आप क्या-क्या बोलते हैं!!

आप पल पल बोलते हैं
आप अविकल बोलते हैं
बोलते हैं आप केवल-
आप केवल बोलते हैं !!

@ जय चक्रवर्ती
17.7.2017

Sunday, 11 May 2014

geet ke meet hain

गीत के मीत हैं मसखरे हम नहीं
लाँघते लाज के दायरे हम नहीं
आँधियों में भी हमने जलाये दीये
मौत की धमकियों से डरे हम नहीं 

kya gazab akhbaar tv hain hmare daur ke...

क्या गज़ब अख़बार- टीवी हैं 
हमारे दौर के 

आवरण जनतंत्र का  निज देह पर 
डाले हुये ये 
अवसरो के साथ अक्सर 
पीत या काले  हुये ये 
कैद इनकी धड़कने हैं 
चमचमाती कोठियों मेँ 
हैं असल में-
धनकुबेरों के सुये पाले हुये ये 

क्या निडर- 
अख़बार-टीवी हैं हमारे दौर के 

है महारथ हाथ रखने की इन्हे 
दुखती  रगों  पर 
बेचते संवेदनाएं कल्पनाओं के 
रथों पर 
हाथ में टी आर पी की ले मशालें 
दौड़ते  हैं - 
सनसनी ,  उत्तेजना ,  सच, झूठ  के 
अन्धे पथों पर

क्या सजग
 अख़बार- टीवी हैं हमारे दौर के   
  
एक पल में 
ये जिसे चाहें उठायें या गिरायें 
मोड़ दें जब मन करे इनका 
हवाओं की दिशायें 
पेड ख़बरें ,आंकड़े ,ओपीनियन 
अनुमान ,सर्वे 
क्या बतायें 
क्या नहीं ,क्या खेल करती ये कथायें 

क्या मुखर 
अख़बार -टीवी हैं हमारे दौर के